नभ की आस – गोकुल चन्द्र उपाध्याय

नभ को छूना चाहूं जो,
मन को कुंठित में कर जाऊं ।।

पंछी बन के आऊं तो,
बाजों से सीस कटाऊं,
नभ को छूने की आस ले,
खुद को ही मिटा जाऊं ।

पानी बनना चाहूं तो,
सागर में समा जाऊं,
नभ को छूने की आस ले,
खुद दरिया बन जाऊं ।

धुआं जो बनना चाहूं तो ,
हवा संग उड़ जाऊं,
नभ को छूने की आस में,
बहता ही चला जाऊं ।

कुंठित मन की आस यही,
जो जैसा है उसे रहने दो,
जब मंज़िल ही कांटो से हो,
तो आस क्यूँ फूलों से हो ।

नभ को छूना चाहूं जो,
मन को कुंठित मैं कर जाऊं ।।

6 Comments

  1. babucm 11/08/2016
  2. gokul72525 11/08/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 11/08/2016
  4. gokul72525 11/08/2016
  5. Kajalsoni 11/08/2016

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