बेरुखी

मैं पत्थर भी नहीं , जो तेरी आँखों को न पढ़ सकूं
मैं मसीहा भी नहीं , हर जख्म दिल का कबूल कर सकूं
मैं तेरी नहीं है मुझे मालूम , है मुझे ये पता ……………
मगर इतना भी गैर न बन की तेरे लिए दुआ भी न बन सकूं …

कई दिनों से दिल खामोश सा था कुछ कहने को ,
अब जब कह दिया तब भी बेचैनी सी दिल में है
तू इतना भी गुरूर न कर ऐ मेरे हमनवा खुद पर
की मैं तेरे सफर में तेरी हमकदम भी न बन सकूं

कई राते काटी है मैंने तेरे इंतज़ार में जग जग के सनम
अब तो आँखों को नींद भी आती ही नहीं …………..
तेरी बेरुखी से बने हालातो की कसम ………………..
कम्भख्त यादें है तेरी जो जाती ही नहीं ……………….!!!!

6 Comments

  1. babucm 11/08/2016
    • tamanna 11/08/2016
  2. mani 11/08/2016
    • tamanna 11/08/2016
  3. Kajalsoni 11/08/2016

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