मैं और तुम …….(वर्ण पिरामिड)

मैं
और
तुम थे
उस हंसी
रात चांदनी
के साये में गुम
सोया था सारा जहां
चिर निंद्रा की आगोश
जैसे चढ़ा काल की भेंट
सारा का सारा शहर आज ।।

था
कोई
अगर
हम तुम
और न कोई
हमारे अलावा
एक साक्षी थी बस
रात चांदनी संग में
लस्कर लिए सितारों का
दामन थामें शशि के साथ।।

हा
बस
हम थे
उस पल
के हकदार
किसी भी तरह
बिताने को तैयार
अपनी मर्जी माफिक
बिना किसी रोक टोक के
पाने को सत्य का पूर्ण सार ।।
!
!
!
डी. के. निवातियां………..!!!

24 Comments

  1. babucm 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  2. Kajalsoni 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  3. शीतलेश थुल 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  4. Meena bhardwaj 10/08/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  7. Shishir "Madhukar" 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  8. mani 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  9. sarvajit singh 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  10. Dr Swati Gupta 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  11. ANAND KUMAR 10/08/2016
    • निवातियाँ डी. के. 10/08/2016
  12. Bhawana Kumari 19/07/2017
    • डी. के. निवातिया 19/07/2017

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