सावन – धीरेन्द्र

घट घटा है घनघोर सी, गर गरज मेघ उतावली
बर बरस बदरा जोर की, हर हरष मन अति बावली

कल कलित नदियाँ भागती, झर झरित झरना बह चली
सर सरित सरिता जागती, हर हरित बगिया कह चली

उत्कंठ कंठ विभोर मन, नव नयन पंख निहारती
सुरमय विनय हर भाव में, पग है धरा की पखारती

जल थल हुई हर भंगिमा, श्रृंगार धार की शोभती
आराध्य साध्य हुए सरल, इनकी कृपा मनमोहती

-धीरेन्द्र

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/08/2016
  2. mani 10/08/2016
  3. babucm 10/08/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 10/08/2016

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