‘लूट लो मेरा ईमान!’_अरुण कुमार तिवारी

लूट लो मेरा ईमान!
लूट लो…..

बिछाओ जाल बुन कर फांस की गांठे निरन्तर,
निचोड़ो रस कि अब इंसान भी रसहीन बैठा हो |
चलो वो चाल कि लोमड़ भी शरमाए बसन्ती बन,
समय की नस दबाये कोबरा संगीन ऐंठा हो |
यही है अब इनाम!
यही है अब इनाम।

लूट लो मेरा ईमान!
लूट लो….

भले मजबूर की नीयत हथेली जोड़ कर तकना,
कहीं एक घर में इज़्ज़त की फिरौती मांगती आँखे।
जलाओ दिल कि ये बैकुंठ जाने की नहीं कूबत,
हवा का रुख निरखती मौन हो बस झांकती शाखें।
बनो मौला इमाम!
बनो मौला इमाम।

लूट लो मेरा ईमान!
लूट लो….

अरे तुम भी तो बसते हो मुझी में जल रहे से,
भले मत नेह लूटो आँख तो मुझसे मिलाओ|
कहो क्यों छिप रहे अब चोर बनकर उस गली में,
कि साधो दाव मैं बीमार मत मुझको जिलाओ|
लगा कर कुछ इल्जाम,
लगा कर कुछ इल्ज़ाम!

लूट लो मेरा ईमान!
लूट लो….

करो कमजोर मुझको तोड़ दो अन्तस् तलक,
लिए हांथो में लाठी भैंस तकते क्यों ठहर?
नही जो रूह की कालिख पिघलती कुछ भी हो,
उगाये धन उगाही की व्यवस्था हर प्रहर|
सत्य का काम तमाम,
सत्य का काम तमाम|

लूट लो मेरा ईमान,
लूट लो मेरा ईमान!

-‘अरुण’
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12 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 08/08/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी 08/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 08/08/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 08/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 08/08/2016
  4. sarvajit singh 09/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 09/08/2016
  5. Bindeshwar prasad sharma 09/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 09/08/2016
  6. mani 09/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 09/08/2016

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