दीवानगी – ग़ज़ल – सर्वजीत सिंह

दीवानगी

प्यार करना हमने तो सीख लिया पर उन्हें सिखायें कैसे
बात जो अब तक दबी हुई है मेरे दिल में उन्हें बतायें कैसे

तसव्वुर में मिलकर तो उनसे मैं किया करता हूँ ढेरों बातें
सामने आ गए तो उन्हें मोहब्बत की दास्तान सुनायें कैसे

खूबसूरती की बेमिसाल मूरत है वो मेरे दिल का वो है सरूर
उसे देखके जो आ जाती है आँखों मैं मदहोशी वो छुपायें कैसे

मेरी दीवानगी की हद ये है के सब कहने लगे हैं मुझे मजनूं
उसके दिल में भी मोहब्बत की आग जलायें तो जलायें कैसे

कबूल हुई अपनी मोहब्बत दो जिस्म इक जान फिर हो गए हम
करिश्मा-ए-कुदरत जो हुआ सर्वजीत दुनिया को वो समझायें कैसे

सर्वजीत सिंह
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24 Comments

  1. mani 08/08/2016
  2. mani 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  3. ANAND KUMAR 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  4. babucm 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  5. Shishir "Madhukar" 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  6. Bindeshwar prasad sharma (bindu) 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  7. Kajalsoni 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  8. निवातियाँ डी. के. 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  9. अरुण कुमार तिवारी 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  10. Meena bhardwaj 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  11. Savita Verma 08/08/2016
    • sarvajit singh 08/08/2016
  12. MANOJ KUMAR 09/08/2016

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