‘जब जज़्बात बहते हैं_अरुण कुमार तिवारी

जब, जज्बात बहते हैं।
जब,जज्बात बहते हैं।

ले अश्रु का रूप,
जलद की बूंदों सरिस,
चीरते आसमान का सीना,
निकल चलते हैं बस,
धरा पर कल कल करते हैं|

जब जज्बात बहते हैं,
जब जज्बात बहते हैं|

तोड़ देते हैं नयनों के पट,
आँखों की कोर भिंगोते|
कौन देख रहा समझ रहा,
इसकी परवाह छोड़े,
झर झर अन्तस् से झरते हैं|

जब जज्बात बहते हैं,
जब जज्बात बहते हैं|

उड़ा देते हैं समझ का पर्दा,
उम्र की बेड़ी काटकर,
बस संवेदना के उफान में,
बह चलते हैं किसी झोके से,
यहाँ -वहाँ ,जहाँ -तहाँ |
न जाने कहाँ कहाँ तक सहते हैं,

जब जज्बात बहते हैं,
जब जज्बात बहते हैं|

किसी अपने की छूटती,
ट्रेन से शुरू होकर,
मिट्टी (देह)की महक उठने तक,
प्रीति की रीति हो या विक्षोभ,
या विरह से मिलन की बेला हो,
अश्रु के सहारे दहते हैं|

जब जज्बात बहते हैं,
जब जज्बात बहते हैं|

‘-अरुण’
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18 Comments

    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  1. निवातियाँ डी. के. 06/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" 06/08/2016
    • kiran kapur gulati 07/08/2016
      • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/08/2016
      • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  4. Kajalsoni 07/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  5. C.m.sharma(babbu) 07/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 07/08/2016
  6. sarvajit singh 07/08/2016
  7. mani 07/08/2016

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