रक्षा बन्धन की

आज खुशी तन को हिलोर रही थी
और मन… मन ताल दे रहा था
ये अपनापन था, सरलता थी आप सबकी
जो सबको उमंग और उछाल दे रहा था

वह जो धागा था, तब बहना ने बांधा था
दिखता था कलाई पर, पर कितना गौण था
किलकारी उल्लास की उठी थी, जो नहीं सुनी थी दो युगों से
अश्रुधार बह सामने जो आयी, वही तो थी, और कौन था !!

मन को धागा इतना जोडता है!, बांधा दो हाथों ने ही था
पिरो लेता है इतनों के मन को अपने में, कितना शक्तिशाली और मौन था
तुम सब ही धन्य हो, जो रक्षा की इस बन्धन की
नहीं तो दो युगों बाद, पूछ्ने वाला यहां कौन था

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
  3. mani 06/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
  4. अरुण कुमार तिवारी 06/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
  5. C.m.sharma(babbu) 06/08/2016
    • Vivek Singh 08/08/2016
  6. Punkaj Goyal 08/08/2016
    • Vivek Singh 27/06/2017

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