ये छवि तेरी

एक तू ही है,
जो देती प्राण,
ममता के आँचल में
सवांरती यूँ मुझको तू

इन पगडंडियों पर,
डगर-मगर जब करते हम,
बन जाती हो ‘मार्गदर्शक’

कहीं यशोदा
तो कंही राधा हो तुम
तो, बन जाती हो
कभी लक्ष्मीबाई

तेरी लड़ाई, खुद तुझसे है
इस पार नहीं, उस पार सही
कल फिर एक सूरज आएगा.
और तेरी गोद में खेलेगा

माँ, नहीं तो ममता का धर्म
तुम फिर से निभा जाओगी
ये ‘जग’ पहले जैसा था
न समझा ‘तुझे’, ना समझेगा… #अभिनय शुक्ला २/०८/२०१६

12 Comments

  1. babucm 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016
  2. शीतलेश थुल 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016
  3. Kajalsoni 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/08/2016
    • अभिनय शुक्ला 06/08/2016

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