माँ के हाथो का निवाला……………मनिंदर सिंह “मनी”

याद आया माँ के हाथो का निवाला,
उसके जैसा नहीं कोई प्यार देने वाला,,
हमदर्द बहुत है इस ज़माने में, पर ऐसा,
नहीं कोई, उसकी कमी पूरी करने वाला,,
सुना दू अपना हर दर्द ऐ गम, पर डरता हूँ,
अपनों के भेष में न हो कोई छलने वाला,,
तलाशा बहुत मैंने, दुनिया की भीड़ में,
वो मजा ना मिला माँ के आँचल में छुपने वाला,,
जाने कहाँ रख दिया ?, वो अलार्म,
माँ के हाथो मार खिला उठाने वाला,,
वो चूहला जर-जर हुआ पड़ा घर के कोने में,
जिस से उतर आती थी रोटियां बन निवाला,,
वो मजा कहाँ? बाती बना शाम ढलते ही,
लालटेन जला सारा घर रोशन करने वाला,,
मुझे आप कुछ भी कह देती, पर सहती ना देख,
दिखता उसे कोई गर गलती से भी मुझे घूरने वाला,,
हर रोज धुले कपडे तन पर, मिलता नहीं वो पल,
भीग ना जायूँ मैं, देख बादल को गुस्सा करने वाला,,
बिना छुट्टी किये हर रोज रगड़ रगड़ दही से,
कभी लस्सी से ठंडे पानी में घंटो नहलाने वाला,,
ऐ माँ “मनी” ने कोशिश बहुत की निशान तेरे पैरो के,
ढूंढने की, पर मिला नहीं रास्ता तुझसे मिलने वाला,,

20 Comments

  1. babucm 05/08/2016
    • mani 05/08/2016
  2. शीतलेश थुल 05/08/2016
    • mani 05/08/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 05/08/2016
    • mani 05/08/2016
    • mani 05/08/2016
  4. Kajalsoni 05/08/2016
    • mani 05/08/2016
  5. Shishir "Madhukar" 05/08/2016
    • mani 06/08/2016
  6. sarvajit singh 05/08/2016
    • mani 06/08/2016
  7. अरुण कुमार तिवारी 05/08/2016
    • kiran kapur gulati 06/08/2016
      • mani 06/08/2016
    • mani 06/08/2016
  8. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/08/2016
    • mani 06/08/2016

Leave a Reply