तुम ही तुम हो…ग़ज़ल

अन्जाम-ऐ-मोहब्बत तू मुझको डराता क्यूँ है…..
अपने ही घर में मेहमान सा नज़र आता क्यूँ है…

हर पल मेरा ही आईना मुझको रुलाता क्यूँ है….
जब भी देखूँ अक्स तेरा ही नज़र आता क्यूँ है….

जब भी देखता हूँ मैं कभी साया अपना…
तेरा ही साया उसमें मुझे नज़र आता क्यूँ है….

जहाँ भी जाऊं नहीं दिखता मुझे कोई खुदा…
हर शय में तेरा ही चेहरा नज़र आता क्यूँ है….

बहुत खोजा बहुत पुछा अब हार गया इस से…
दिल जो था मेरा वो धड़कन तेरी सुनाता क्यूँ है…

तुम ही तुम हो बस तुम ही हो ये पता है मुझे…..
फिर भी “दिल तेरा” यह मुझको सुनाता क्यूँ है….

हर तरफ बस एक ही चर्चा है ज़माने में “बब्बू”….
यह दीवाना बस एक ही अफसाना सुनाता क्यूँ है…
\
/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)

24 Comments

  1. mani 05/08/2016
    • kiran kapur gulati 05/08/2016
      • babucm 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  2. Er Anand Sagar Pandey 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  3. Bindeshwar prasad sharma (bindu) 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  4. sarvajit singh 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  5. ALKA 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  6. Shishir "Madhukar" 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  7. Kajalsoni 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  8. निवातियाँ डी. के. 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  9. शीतलेश थुल 05/08/2016
    • babucm 05/08/2016
  10. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/08/2016
  11. C.m.sharma(babbu) 05/08/2016

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