मै ही क्यूँ (बलात्कार)

थी वो बहुत शांत सी
जैसे समंदर में कोई लहरों को समेटे,

बातें उसकी मनमोहक ऐसी
की एक साथ कई फूल खिल उठे

भोली आँखों में उसके आंसू ऐसे
जेसे हजारों प्रश्न पूछ रहे हों दुनिया से

कुछ राक्षस इस दुनिया में छिपे बैठे
जो उसकी रूह को तार-तार कर गए

दो जहानों के दर्द थे हर बात में उसकी
एक अनजानी चुभन थी जज्बात में उसकी
सौ बार मरेंगे वो दरिन्दे
एक एक आह में उसकी

इस दुनिया को जला दूँ या खुद को जला लूँ
उन दरिंदों कि सजा खुद को कैसे दूँ
उसके कानों में बस यही बातें थी गूंजती
आखिर मै ही क्यूँ……..

मरहम लगाने तो सब आये बाद में
पर उस वक़्त मदद करने कोई न आया
वो तो खुश थी जीवन में अपने
भगवान् उसे तूने ऐसा दिन क्यूँ दिखाया

पापा की परि कहती थी खुद को
अब तो नजरे भी न मिला पाती वो
भाई के साथ खेले तो गुजरा जमाना हुआ
अब तो उससे भी नजरे चुराती वो

गुमसुम सी बैठी देखे जा रही खिड़की के बाहर
शायद खुदा दे दे जवाब ऊपर से आकर
आखिर मै ही क्यूँ……

22 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
  2. RAVINDRA KUMAR RAMAN 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
  3. mani 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
  4. Kajalsoni 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 04/08/2016
    • shrija kumari 04/08/2016
      • kiran kapur gulati 04/08/2016
        • shrija kumari 05/08/2016
  6. sarvajit singh 04/08/2016
    • shrija kumari 05/08/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/08/2016
    • shrija kumari 05/08/2016
  8. Dr Chhote Lal Singh 05/08/2016
    • shrija kumari 05/08/2016
  9. babucm 05/08/2016
    • shrija kumari 05/08/2016

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