त्याग- प्रियंका ‘अलका’

मामा (दादी) को गुजरे
छ: साल हो गए
पर मुझमें वो
आज भी जिंदा हैं ।

वो मेरे
और मैं उनके
बहुत करीब थी
जैसे बादल और बूंदें
बादल ऊपर हीं रह गया
बूंदें नीचे छूट गईं ।।

मामा जीने के लिए
रिश्तों को जीती थी
मुझसे हमेशा कहती
अपनी आँचल की कोर से
रिश्तों को बाँध कर रखना
बहुत प्रेम करना
बहुत त्याग करना
और हाँ…
अपने स्वाभिमान को
संभाल कर रखना
बूरे वक्त में
सिर्फ वही साथ होता है।

तब उनकी बात
मुझे समझ नहीं आती थी,
अपने गुस्से को
अपना स्वाभिमान समझ
मैं बहुत इतराती थी ।।

मैं समझ नहीं पाती थी
अगर प्रेम करूँ
तो त्याग क्यों ??
त्याग ही दिया
तो प्रेम कैसा??

पर अब उनकी
सारी बातें
समझ में आती हैं
उनकी झुर्रियों में
छिपे सारे रहस्य
अब समझ में
आते हैं ।

कल रात मामा
सपने में आईं थीं
नाराज थीं
बात भी नहीं किया
मैं जैसे हीं
उनके पास गई
नींद ने भी
साथ छोड़ दिया ।।

अब मन बहुत बेचैन है
समझ नहीं पा रही
चूक कहाँ हुई
प्रेम करने में
या त्याग करने में ।।

अलका

25 Comments

  1. ANAND KUMAR 03/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" 03/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  3. Kajalsoni 03/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  5. अभिनय शुक्ला 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  6. अभिनय शुक्ला 04/08/2016
  7. kiran kapur gulati 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
      • ALKA 04/08/2016
  8. Dr Chhote Lal Singh 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  9. mani 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  10. Bindeshwar prasad sharma (bindu) 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
    • ALKA 04/08/2016
  11. C.m.sharma(babbu) 04/08/2016
  12. Meena bhardwaj 12/08/2016
  13. शीतलेश थुल 12/08/2016

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