समझ का पुल – प्रियंका ‘अलका’

तेरे मेरे बीच में
समझ का एक ठोस पुुल है
तुम जानते हो
मैं गुस्से की गठरी हूँ
मैं जानती हूँ
तुम धैर्य के देवता हो ।

तुम जानते हो
मेरा क्रोध
समुद्र तट का रेत है
जो एक पल तो
बहुत तेज तपता है
पर जैसे हीं
तुम्हारे प्रेम और
धैर्य की लहरें
उसे छूती हैं
वो उन लहरों में घुल कर
उसकी शीतलता के संग
बह जाता है। ।

मैं जानती हूँ
तुम मेरे क्रोध को
समझते हो ।

मैं जानती हूँ
तुम्हें क्रोध नहीं आता
तुम धैर्य को जीते हो ।।
तुम्हारी वाणी
तुम्हारे मन और मस्तक के
भावों को
खुबसूरती और ईमानदारी से
दर्शाती हैं ।

तुम जानते हो
मैं क्रोध में बोलती हूँ
मैं जानती हूँ
तुम क्रोध में नहीं बोलते ।।

और…………

आज तुम्हारा धैर्य
मेरे क्रोध से हार गया ।

मैंने क्रोध में कहा
मुझे तुमसे प्रेम नहीं
तुमने धैर्य से कहा
तुम्हें भी मुझसे प्रेम नहीं ।।

और हाँ……..

तेरे मेरे बीच में
जो समझ का पुल था
उसमें आज एक
गहरे सुराख ने
आकार लिया है ।

अलका

21 Comments

    • ALKA 02/08/2016
  1. Shishir "Madhukar" 02/08/2016
    • ALKA 02/08/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 02/08/2016
    • ALKA 02/08/2016
  3. mani 02/08/2016
    • ALKA 02/08/2016
      • kiran kapur gulati 03/08/2016
        • ALKA 03/08/2016
  4. Meena bhardwaj 02/08/2016
    • ALKA 02/08/2016
  5. Kajalsoni 02/08/2016
    • ALKA 02/08/2016
  6. अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
    • ALKA 03/08/2016
  7. रामबली गुप्ता 03/08/2016
    • ALKA 03/08/2016
  8. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/08/2016
  9. Jay Kumar 03/08/2016
  10. C.m.sharma(babbu) 03/08/2016

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