‘कलम उठा!’-अरुण कुमार तिवारी

कलम उठा!
कलम उठा! प्रहार कर!
कलम उठा…..

न दर्श मूक बन ये तन्त्र की दशा,
क्या फर्क तू खड़ा घिरा कसा कसा|
वृथा न कर रुदन निहार निज व्यथा,
तू चेतना विजित बने विचार कर!
कलम उठा!

कलम उठा, प्रहार कर!
कलम उठा!

जो हैं कृपाण तान सर खड़े समर,
ईमान बेचते ये तुच्छ दाम पर|
करेंगे सामना कहाँ अडिग तेरा?
तू लक्ष्य कर निशान शब्द बान पर।
कलम उठा!

कलम उठा, प्रहार कर!
कलम उठा!

बढ़ी अगर कुतंत्र की ये भ्रष्टता,
है गर चढ़ी उरोह तक ये धृष्टता|
कलम की झुकती शाख का प्रमाण है,
है कुंद पड़ी विज्ञता, विशिष्टता |
कलम उठा!

कलम उठा,प्रहार कर!
कलम उठा!

जो रुक गया विचार त्याग कर अभी,
न होगा मातृ ऋण उऋण सफल कभी|
अगर है अस्त्र वार सीमा पार तक,
तो लेखनी की धार भी तो कम नहीं।
कलम उठा!

कलम उठा,प्रहार कर!
कलम उठा!
कलम……उठा….

-‘अरुण’
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12 Comments

  1. babucm 30/07/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी 30/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" 30/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  4. sarvajit singh 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
      • kiran kapur gulati 31/07/2016
        • अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  5. Kajalsoni 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  6. mani 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016

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