नफरत का बाजार

हिन्दी साहित्य काव्य संकलन और मंच को सादर दो मुक्तक
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नफरतों ने कितनो के ईमान को है लूटा
किसी का मकान किसी का शहर है छूटा
नफरतों के बाजार में जमीर कहाँ है टिका
बेईमानो का साथ देकर अब इंसान है टूटा
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अगर नफरत करोगे तो होगे तुम बदनाम
रोज मिलेगा तुम्‍हे एक आतंक का पैगाम
अगर थोडी सी भी बची तुझमें इनसानियत
छोड़ो इस नफरत को, करो प्‍यार से सलाम
अभिषेक शर्मा “अभि”
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जय महर्षि गौतम

11 Comments

  1. babucm 30/07/2016
  2. RAJEEV GUPTA 30/07/2016
  3. mani 30/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 30/07/2016
  5. Kajalsoni 30/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" 30/07/2016
  7. Dushyant Patel 30/07/2016
  8. sarvajit singh 30/07/2016
  9. Dr Swati Gupta 30/07/2016
  10. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/07/2016

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