“बोन्साई”

एक मुद्दत पहले गीली माटी में
घुटनों के बल बैठ कर
टूटी सीपियों और शंखों के बीच
अपनी तर्जनी के पोर से
मैनें तुम्हारा नाम लिखा था ।

यकबयक मन में एक दिन
अपनी नादानी देखने की
हसरत सी जागी तो पाया

भूरी सूखी सैकत के बीच
ईंट-पत्थरों का जंगल खड़ा था
और जहाँ बैठ कर कभी
मैने तुम्हारा नाम लिखा था
मनमोहक सा बोन्साई का एक पेड़ खड़ा था ।।

“मीना भारद्वाज”

18 Comments

    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  3. babucm 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  4. RAJEEV GUPTA 29/07/2016
  5. Meena bhardwaj 29/07/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  7. mani 29/07/2016
    • Meena bhardwaj 29/07/2016
  8. Kajalsoni 29/07/2016
  9. Meena bhardwaj 29/07/2016

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