दिल की आग

दीवार से लगकर कोने में रोता है कोई ।
आंसुओं से अपने दर्द को भिगोता है कोई ।
लोगों के तमाशे से बचकर निकल रहा,
अँधेरी रात इस राह से गुजरता है कोई ।
अरमानों के दीपक अब जल चुके हैं सारे,
बुझे मन से इस घर में रहता है कोई ।
न बेकरारी बची है न इंतज़ार अब रहा,
अपने दिल की आग में झुलसता है कोई ।
जख्म होते तो शायद इलाज मिल जाता,
नासूर को साथ में लिए फिरता है कोई ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

28 Comments

  1. RAJEEV GUPTA 27/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" 27/07/2016
  3. babucm 27/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 27/07/2016
  5. mani 27/07/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 27/07/2016
  7. Meena bhardwaj 27/07/2016
  8. Writer Satyam Srivastava 27/07/2016
  9. Bindeshwar prasad sharma (bindu) 27/07/2016
  10. sarvajit singh 27/07/2016
  11. Kajalsoni 27/07/2016
  12. Raj Kumar Gupta 27/07/2016
  13. अरुण कुमार तिवारी 28/07/2016

Leave a Reply to अभिषेक शर्मा ""अभि"" Cancel reply