क़दमों के निशां

भीगी पलकें ,खोई नजरें , रुकी रुकी सी जुबां ,
कैसे कहिये ,इस हाले दिल के बयां और भी हैं।

लोग कहतें हैं ,कि आसां नहीं है जिंदगी का सफर.
कि दिल की इस जमीं पर, क़दमों के निशां और भी हैं।

छोटी छोटी उलझनों से घबरा गए इस कदर आप क्यूँ ?
कि इस जिंदगी में देने को बाकी, कई इम्तेहां और भी हैं।

क्यूँ इस भीड़ में ढुढां करें हैं आप किसी अपने को ?
कि इस महफ़िल में,कई लोग आप ही की तरह तन्हां और भी हैं।

इक दिल के टूटने से , आपने रोक दिए क्यों कदम ,
चलते रहिये, कि दिल के आगे इक जहाँ और भी है।

10 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 27/07/2016
    • Manjusha 27/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" 27/07/2016
    • Manjusha 27/07/2016
  3. mani 27/07/2016
    • Manjusha 27/07/2016
  4. Kajalsoni 27/07/2016
    • Manjusha 28/07/2016
  5. Dr C L Singh 27/07/2016
    • Manjusha 28/07/2016

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