ढलता बचपन

एक अबोध मन
ये क्या कर रहा
अपने नाजुक हाथों से
सबका पेट भर रहा

मजबूरी इतनी कि
बाल कृषक बनना पड़ा
हर खुशी परिवार को मिले
ऐसे तनकर हुआ खड़ा
कैसे एक माँ बाप का हीरा
धूप में तपता जल रहा
सबका पेट भर रहा.

करता हर जिम्मेदारी का निर्वहन
ढोता कंधो पर भार
पर व्यथित मन
कलम किताबें कहीं
दूर क्षितिज पर
वह अंगारों पर चल रहा
सबका पेट भर रहा.

नर्म हाथों में
हंसिया कुदाल
फावडा देखा
हल बैल के पीछे पीछे
बनती जीवन रेखा देखा
कसक कलेजे में
टीसती चुभती
भविष्य का एक सितारा
कैसे पल रहा
सबका पेट भर रहा.

काल क्रूरता की निर्ममता
दिखता जाता घोर विषमता
किसके दोजख का ये फल है
हँसता बचपन ढल रहा
सबका पेट भर रहा !!
!
!
डॉ.सी.एल.सिंह

9 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/07/2016
  2. babucm 26/07/2016
  3. mani 26/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 26/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" 26/07/2016
  6. Dr C L Singh 26/07/2016
  7. sarvajit singh 26/07/2016
  8. Kajalsoni 26/07/2016

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