जगत शमशान बन जायेगा

कहीं भी कुछ कमी नहीं
बारात यादों की थमी नहीं
जब भी कोई आघात हुआ
आँखों को नमी का अहसास हुआ
आज हर जगह बरसरते शोले हैं
फटते रोज़ कहीं गोले हैं
कैसा रुख किया दुनिया ने
इंसानों ने विष ये घोलें हैं
स्वार्थ सिद्ध करने को आज
इंसानियत की कीमत कुछ भी नहीं
क्या खून की होली खेलने पर
किसी को भी कोई दुःख नहीं
जाती हैं जानें ,तो जाने दो
स्वार्थ से बड़ा कोई सुख नहीं
मन में बात इक बैठ गयी
ठीक उसे बताने को
बरपा है तबाही का मंज़र
फर्क भगवान ,ख़ुदा में बताने को
आँखों ने जिसे देखा ही नहीं
दिल ने ही महसूस किया है
कहाँ आसमान में वह बैठा है
दिल के हर गोशे में वह रहता है
खुद के अंदर झाँक के देखो
पता उसका मिल जायेगा
आंख देख पाए यां न पाए
पर दिल ही सब बताएगा
न छीनो इंसानियत इंसानो से
यह जगत शमशान बन जायेगा
जुड़ना बिखरने से बेहतर है
न घोलो विष इस दुनिया में
सुख चैन बियाबानों से बेहतर है

13 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 25/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016
  3. mani 26/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 26/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 26/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" 26/07/2016
    • kiran kapur gulati 27/07/2016

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