बचकानी सी जवानी में,
मुहब्बत हो गयी,
हुस्न से कहर ढहाते,
देख उनको,
मेरे इश्क की फरियाद,
इबाद्दत हो गयी,
करे कबूल या ना,
उसकी मर्जी,
सारी दुनिया मेरे इश्क की,
गवाह हो गयी,
दिलकश अदा से,
लट को चेहरे पर गिरना,
चांदनी भी शर्मा जाये,
खूबसूरती की इन्तिहाँ हो गयी,
कैसा रोग लगा बैठा ?
बेकार हर दवा हो गयी,
पर मिलन मुमकिन नहीं,
ऐ “मनी” तेरी इश्क से बड़ी,
दौलत की दीवार हो गयी,
मणि जी अच्छी रचना है
तहे दिल आभार किरण जी आपका
Bahut khoobsoorat……..
तहे दिल धन्यवाद सी एम् शर्मा जी…….
बहुत खूबसुरत मनी….. ।।
तहे दिल धन्यवाद निवातियाँ जी
मनी जी थोड़ा और जोर लगाते तो रचना में और उभार आता। कही कही भटकाव नजर आता है। शेष मूर्धन्य मनीषी जानते है।
सुरेंद्र जी मैं फिर अपनी कोशिश करूँगा इसमें सुधर करने की तहे दिल आभार आपका
जोर लगा के दीवार को तोड़ दीजिये, प्रयास ऐसा कीजिये दिल को दिल से जोड़ दीजिये. बहुत खूब ………..
thanku vijay sir
भावों का सुन्दर चित्रण मनिंदर
thanks shishir sir…..