जाने क्यों ?…………..मनिंदर सिंह “मनी”

जाने क्यों ?
कलम पकड़ हाथ,
चल नहीं रहे,
कागज को कर दे तृप्त,
वो लफ्ज़ मिल नहीं रहे,
देख हालात-ऐ-जिंदगी,
रूह खुश हो जाये,
बहुत ढूंढे,
ऐसे पल मिल नहीं रहे,
ना इश्क आग का दरिया,
ना कच्चा घड़ा ले,
कोई उसमे डूब रहा,
ना कोई मिर्ज़ा बन,
तीरो का शिकार हो रहा,
ना कुदरत करती,
दिख रही श्रृंगार,
ना पेड़ो की छाव,
ना जल की,
कल कल करती आवाज़,
ना बुझ रही धरती की प्यास,
हर तरफ नफ़रतो का,
धुंआ धुंआ सा,
दिल में हर किसी के खार,
सड़ने को मजबूर,
दीवारों में बंद अनाज,
कुपोषण, भुखमरी पर,
बड़ी बड़ी बहस हो रही आज,
ना रहा रिश्तो में प्यार,
ना छोटे बड़े का लिहाज़,
कोई कुछ पाने में,
कोई कुछ दिखाने में,
बन रहा हर कोई एक दूसरे का खास,
सच पढ़ेगा कौन ?, सच सुनेगा कौन ?,
आत्म चिंतन दर्पण में खुद को देखेगा कौन ?,
ऐ “मनी” हमाम में सब नंगे,
सब को पता हर किसी की फितरत का,
फिर एक दूसरे से शर्म करेगा कौन ?
जाने क्यों ?………….

17 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
      • mani 25/07/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  5. Rinki Raut 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  6. C.m.sharma(babbu) 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  7. Meena bhardwaj 24/07/2016
    • mani 25/07/2016
  8. sarvajit singh 24/07/2016
    • mani 25/07/2016

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