रगड़ रगड़कर घिस घिसकर
अपना हर जज्बात बने
भला करूंगा क्या पढ़ लिखकर
जब तक ना हालात बने

जेहन को जमीर से जोड़े
हो कुछ ऐसे सवालात खड़े
भटक न पाए जो लालुच में
ऐसे कुछ ख्यालात बने

कर रहे हम मशीने पैदा
सिर्फ फायदा करने की
थोड़ी बहुत उम्मीदें दे दो
कुछ कायदा करने की

मैं भी बड़ा हूँ असमंजस में
कहाँ तक जाएगा भटकाव
और कितने होंगे बदरंग हम
कितने दिन खाएंगे पुलाव

जो सिखाये इंसान बनना
कोई तो ऐसी किताब बने
बिना बताये,रास्ता दिखाए
कैसे कोई आफताब बने

3 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 24/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
  3. Savita Verma 24/07/2016

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