मैं किनारा हूँ…लहरों सा मचलते रहिए…

किसी गुल सा मेरे गुलशन में भी खिलते रहिए…

कभी दो चार दिन में हमसे भी मिलते रहिए…

तेरि अटखेलियों का मैं भी इक दिवाना हूँ…

मैं किनारा हूँ…लहरों सा मचलते रहिए…

मेरी नजरों को तेरे दीद की तमन्ना है…

यूँ ही हर रोज सुबहो शाम निकलते रहिए…

मैं तुझे दूंगा सहारा ये मेरा वादा है…

मेरे आँगन में हर इक रोज फिसलते रहिए..

– सोनित

11 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 24/07/2016
  2. mani 24/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 24/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" 24/07/2016
  6. अरुण कुमार तिवारी 24/07/2016
  7. Savita Verma 24/07/2016
  8. Kajalsoni 24/07/2016
  9. sarvajit singh 24/07/2016
  10. Meena bhardwaj 24/07/2016
  11. सोनित 25/07/2016

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