प्रकृति

हिमगिरि कहीं वृहद मरुस्थल
कही स्याह रात कही दिवा धुप
अतिशय शांति कही शेर गर्जना
मनोहारिणी कही विभस्त रूप

कहीं हरसिंगार फैलाती सुगंध
कही कीट विहग की चहचहाहट
कहीं शैल शिखा से गिरती धारा
कही पवन की नीरव सनसनाहट

कही घन में ओझल होता रवि
कही रवि से ओझल होता घन
गूढ़ रहस्य समेटे धुप छाव का
खिले प्रफुल्लित प्रकृति हरक्षन

झरने का कलरव कही बियावान
ऊँचे दरख्तों से छन आती धूप
बैठ तरु तल बस लिखता जाऊ
प्रकृति का अवर्णित अद्भुत रूप

प्रकृति के आँचल में चिर सुख
प्रकृति तांडव से मिलता दुःख
प्रकृति हँसाती रुलाती, खोलती
नव सृजनता का विशाल मुख

जल थल नभ रवि शशि तारक
शैल सरिता कानन हिम झरना
विभिन्न रूप व आधार आकृति
अनन्य अनंत प्रकृति का गहना

प्रकृति एक रमणीक दुल्हन सी
जग कर रहा इसका चीरहरण
इसकी रूप आबरू बचाने को
आज न दिखता कोई अवतरण

सम्प्रति चक्षु समक्ष जो प्रकृति
क्या भविष्य में भी रह पायेगी
आज जो लिख रही मेरी कलम
क्या कल भी कलम दुहराएगी!!
!!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

21 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 23/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  2. Savita Verma 23/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  3. Kajalsoni 23/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" 23/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 23/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  6. sarvajit singh 24/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
  7. mani 24/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
  8. Raj Kumar Gupta 24/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/07/2016
  9. Meena bhardwaj 24/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/08/2016
  10. Er Anand Sagar Pandey 05/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/08/2016
  11. Ravi Kumar 22/05/2017

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