अमर बेल – शिशिर मधुकर

मुहब्बत के इस ज़माने में जो भी खेल होते हैं
बिछडी हुई कुछ रूहों के बस सब मेल होते हैं
बिना सोचे दुनियाँ ने कई गुलशन कुचल डाले
फूल फ़िर खिले उन पर अमर जो बेल होते हैं

शिशिर मधुकर

13 Comments

    • Shishir "Madhukar" 23/07/2016
  1. C.m.sharma(babbu) 23/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" 23/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 23/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" 23/07/2016
  6. sarvajit singh 24/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 24/07/2016
  7. mani 24/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 24/07/2016
  8. Raj Kumar Gupta 24/07/2016

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