जिगर का टुकड़ा

जिगर का टूकड़ा
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एक जिगर का टूकड़ा मेरा
जा रहा मुख मोड़कर .
माँ को अपने छोड़कर
माँ को अपने छोड़कर

आँसुओं का जलजला
तन मन में मेरे छा गया
हे विधाता क्या किया
जीवन में ये विष घोलकर
एक जिगर का टूकड़ा मेरा …..

झुकी हुई पसलीयों में
वृद्धों का कैसे हो बशर
सांसो की ये डोर पतली
चला गया है तोड़कर
एक जिगर का टूकड़ा मेरा …

ग़म का आया ये बवंडर
रूह को झकझोरता
वक्त की आँधी चली
किस्मत को मेरे फोड़कर
एक जिगर का टूकड़ा मेरा …

इतना हिम्मत हौसला
दे मेरे परवर दिगार
लाल मेरा जब गया
जै हिन्द बोली बोलकर

एक जिगर का टूकड़ा मेरा
जा रहा मुख मोड़कर
माँ को अपने छोड़कर
माँ को अपने छोड़कर

डॉ सी एल सिंह

12 Comments

  1. सोनित 22/07/2016
  2. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 22/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/07/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 22/07/2016
  6. Kajalsoni 22/07/2016
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/07/2016
  8. mani mani 23/07/2016
  9. Ramdiya 15/09/2019
  10. Ramdiya 15/09/2019
  11. Ramdiya 15/09/2019

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