सावन

बीता आषाढ़ मास आया सावन
मेघ झरे श्यामल नभ से छन छन
चहुँ ओर नव पल्लव लेता जीवन
पथ प्रशस्त सृजनता का हर क्षन

उमड़े घन घनघोर घिरा व्योम सारा
दिनकर छिपे गिरा उष्णता का पारा
गहराती अवनि पर तमी अधियारा
शैल शिखा उमड़ती विहंगम धारा

सरर सरर सरगम स्वर नीड़ बजाते
चातक विरह वेदना की राग सुनाते
प्रणयातुर कीट विहग रोम सिहराते
म्याऊ म्याऊ करता मोर दादुर टर्राते

रिमझिम-रिमझिम नभ गिराए मोती
शीतल सौम्य नव प्रकृति तन धोती
नदियाँ पहाण वन सब विह्वल होती
तपती विरहिणी कही बदन भिगोती

बेल लतिका शिखर छूने को प्यासी
विरहि सरिता सागर से मिलने जाती
झर झर बहते नैन साजन अभिलाषी
कर क्रंदन बैठी कोई रमणी उदासी
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सुरेन्द्र नाथ सिंह ” कुशक्षत्रप”

25 Comments

    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  1. babucm 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  2. mani 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  3. RAJEEV GUPTA 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  5. Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  6. Meena bhardwaj 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  7. Kajalsoni 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  8. sarvajit singh 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
  9. अरुण कुमार तिवारी 21/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
      • अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
  10. Rinki Raut 22/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
  11. Shishir "Madhukar" 22/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016

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