जय शिव शंकर !

:: (प्रथम) ::

जय त्रिकालदर्शी,
जय शिव शंकर !

मंदिर-मंदिर घूमते, ढूंढते हर शिवालय,
तुझसे ही सब बने हैं, नहीं इसका भान,
खुद में झांककर, मन का विष हटाकर,
खुद में ही तुझको पाते नहीं इसका ज्ञान,
सृष्टि निर्माण हेतु कितने त्याग तूने किये,
तेरे मार्ग पर चलने का नहीं लेते संज्ञान ।

जय त्रिकालदर्शी,
जय शिव शंकर !

ज्ञात न था ब्रह्मा को, पहले नर ही बनाये,
अर्धनारीश्वर रूप देख, सृष्टि का ज्ञान पाया,
कल्पों बाद शक्ति ने सती का जब रूप धरा,
दक्ष की संतान बन उनके घर जन्म पाया,
दक्ष ने अभिमान किया, तेरा अपमान किया,
रुष्ठ होकर सती ने तब खुद को ही मिटाया ।

जय त्रिकालदर्शी,
जय शिव शंकर !

दक्ष का अभिमान गया और गया प्राण,
प्रसूति की याचना ने दक्ष को जीवित कराया,
भूलकर अभिमान सारे पाकर अंतः ज्ञान,
मुक्ति हेतु दक्ष ने काशी में डेरा जमाया,
तेरे तांडव से जब प्रलय सी स्थितियां बनी,
सती के टुकड़े कर नारायण ने सृष्टि बचाया ।

जय त्रिकालदर्शी,
जय शिव शंकर !

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

16 Comments

  1. mani 21/07/2016
  2. babucm 21/07/2016
  3. Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 21/07/2016
  4. RAJEEV GUPTA 21/07/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 21/07/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/07/2016
  7. sarvajit singh 21/07/2016

Leave a Reply