सर्वहारा

सर्वहारा
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सूखा है तन
भूखा है तन
औऱ बेचैन मन.

बहते पसीने में
मुश्किल से जीने में
कितना रूखा है तन
और बेचैन मन

श्रमजीवी श्रमिक
जो पाता पारिश्रमिक
है कितना बड़ा धन
और बेचैन मन.

उसके लहू का रंग
कौन कर रहा बदरंग
पूछता आम जन
और बेचैन मन.

रूह को तड़पता देख जाता नहीँ
वो अपना ही है
पर कोई आगे आता नहीँ
है ये कैसी जलन
और बेचैन मन.

ख्वाहिशें हर घर की
पूरा करे
इतनी जुर्रत कहाँ कुछ अधूरा करे
एक पल ही सही मिटा लेता थकन
और बेचैन मन

जर्रा जर्रा ऋणी है
उसके उपकारों का
कैसे कटता है दिन
बेसहारो का
वेदना में ही ओढ़ लेता कफ़न
और बेचैन मन..
!
!
??डॉ सी एल सिंह ??

11 Comments

  1. RAJEEV GUPTA 20/07/2016
    • Dr Chhote Lal Singh 20/07/2016
    • Dr Chhote Lal Singh 20/07/2016
  2. mani 20/07/2016
  3. Dr Chhote Lal Singh 20/07/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 20/07/2016
  5. sarvajit singh 20/07/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  7. C.m.sharma(babbu) 20/07/2016
  8. Shishir "Madhukar" 21/07/2016

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