ग़ज़ल (बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था)

ग़ज़ल (बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था)

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी
बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

बारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़री
भोले भाले चेहरे में सयानापन समाता था

मिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों
मिलाकर हाथ, पीछे से मुझको मार जाता था

सुना है आजकल कि बह नियमों को बनाता है
बचपन में गुरूजी से जो अक्सर मार खाता था

उधर माँ बाप तन्हा थे इधर बेटा अकेला था
पैसे की ललक देखो दिन कैसे दिखाता था

जिसे देखे हुआ अर्सा , उसका हाल जब पूछा
बाकी ठीक है कहकर वह ताना मार जाता था

मदन मोहन सक्सेना

मदन मोहन सक्सेना

8 Comments

  1. Madan Mohan Saxena 20/07/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 20/07/2016
  3. mani 20/07/2016
  4. babucm 20/07/2016
  5. Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 20/07/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016

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