गुरु महत्ता

जग सारा मिटटी सदृश्य पड़ा
गुरु कृपा से बनता सुघर घड़ा
नर ज्ञान ले देव पंक्ति में खड़ा
बन निर्भय उच्च शिखर चढ़ा

संसार गोविन्द को जान न पाता
गर गुरु नहीं सच्ची राह दिखाता
गुरु प्रकाश जब नर-नारी पाता
जीने का उद्देश्य समझ में आता

दिव्य ज्ञान दीक्षा की मिटे प्यास
सच्चे गुरुवर का जब मिले साथ
पहुचता नर साक्षात् प्रभु के पास
कट जाता पल में सारा मोहपाश

गुरु पारस करते लोहे को सोना
गुरु कृपा हो तब काहे को रोना
नानक कबीर की वाणी सलोना
गुरु अमृत कलश इसे न खोना

गुरु सतगुण से अवगुण हरते
तब कहीं हम भवसागर तरते
गुरु माता पिता से होते बढ़के
नमन गुरु चरणों में शीश रखके
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सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

25 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  2. sarvajit singh 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  3. sukhmangl 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
      • Kiran Kapur Gulatit 20/07/2016
        • Kiran Kapur Gulatit 20/07/2016
        • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  5. Meena bhardwaj 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  6. mani 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  7. babucm 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  8. Dr Swati Gupta 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
  9. Rajeev Gupta 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016

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