गुमराह

अब तुम बतला दो यकीं
करूँ किस कहानी पर
और कितना रोऊँ दोराहे
खड़ी इस जवानी पर

लेकर दिल में प्यार बहुत
सेवा को मैं निकला था
क्या बताऊँ क्या क्या
जुल्म हुए मनमानी पर

बचाया जिसको धूप दर्द से
उसने ही पत्थर मारा है
खून गया बेकार मेरा
अपनों ने ललकारा है

भूल जाते हैं बेगैरत
किये गए अहसानों को
गुमराह करके भेड़िये
सजाते कब्रिस्तानों को

7 Comments

  1. shrija kumari 19/07/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" 20/07/2016
  4. babucm 20/07/2016
  5. Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 20/07/2016
  6. Rakesh Kumar 21/05/2020

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