मात् दिवस

रंग निराले दुनिआ के ,जो तेरी गोद से देखे थे।
चढ़ती उम्र के सायों में जाने कितने बदल गए है।
कभी चीख कर रोता था झट से उठा लेते थे ,
ढलते यौवन के रस में जाने कहाँ वो लोग गए हैं।

मै तेरा मधुकर जैसा हूँ ,तू मेरा फूल कुमुदिनी है।
मै तेरा अल्हड बेटा हूँ ,और तू मेरी जग जननी है।
तेरे दिवस को जीते जीते मै सदियाँ यूँही जी लूंगा।
ममता का उपहार बना तो,प्रेम नदी को एक घूँट में पी लूँगा।

बन कर सूरज तेरी किरणों में,तेरा तेज समाएगा।
चमकेंगे रेशम के वस्त्र मगर ,तेरा पल्लू ही भाएगा।
साथ बीते पल जीवन के ,मैंने सभाल कर यादों में रखे हैं।
कभी कभी आँखों में मेरी चल चित्र से लगते हैं।

अपने आलस्य के चलते मै तुझको फिर हार गया हूँ।
खोकर अपने बहुमूल्य समय को खुद का जीवन मार गया हूँ।
मेरी शेष बची पंक्ति में ,तू ममता का प्याला बनती।
पूरी होती कविता मेरी ,मेरा तू जग सारा बनती।
by प्रेम IMG-20151113-WA0003

2 Comments

  1. babucm 19/07/2016

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