प्रकृति…


सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान
हाँ, यही तो हैं,……
इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार II

—-:: डी. के. निवतियाँ ::—-

18 Comments

  1. RAJEEV GUPTA 18/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  2. mani 18/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
      • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  4. sarvajit singh 18/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" 19/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
  6. babucm 19/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
  7. Meena bhardwaj 19/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/07/2016

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