हर एक लम्हां, याद बन जाता हैं…

हर एक लम्हां, याद बन जाता हैं…..
तूँ! उन यादों की किताब, क्यों सजाता हैं।
जब देखता हैं, तूँ! पलटकर उन पन्नों को….
तूँ! हंसता हैं या रोता हैं, कुछ समझ नहीं आता हैं।
उन यादों को जीने में, हर लम्हां, यूँ ही गुजर जाता हैं…
हर एक लम्हां, बस एक याद बन जाता हैं…
हर एक लम्हां, बस एक याद बन जाता हैं…
भागचन्द अहिरवार “निराला”

8 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 17/07/2016
  2. mani 17/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" 17/07/2016
  4. Dr Chhote Lal Singh 18/07/2016
  5. भागचन्द अहिरवार "निराला" 19/07/2016
  6. भागचन्द अहिरवार "निराला" 19/07/2016

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