आँगन का बटवारा

कल तक सब कुछ था हम सभी का
अब पूरब मेरा पश्चिम तुम्हारा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।

माँ बाप का बहा होंगा खून पसीना
मुफिलिसी में पड़ा होंगा कभी जीना
बड़े जत्तनो से बना होंगा आशियाना
जिसे हमने बाँट किया छलनी सीना
आज हमारी एकता का कबाड़ा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।

माँ बिलखती फटती पिता की छाती
कितना निर्मम हुवा बुढ़ापे की लाठी
जीते-जी बटे निज कलेजे के टुकड़े
बेबस आँखे एकटक शून्य निहारती
अब तो लगता जीवन बेसहारा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।

खेत बट गया खलिहान बट गया
दूध माफिक अपना प्यार फट गया
खीच गई घर बीच सरहदी दिवार
रंजिश में पुराना दरख़्त कट गया
बुझा चिराग प्रेम का अधियारा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।

कुछ पुरानी यादें———
दिनभर भले पड़ा हो अकेले बिताना
रात में एक साथ ही होता था खाना
हँसी मजाक बीच सुख-दुःख की बातें
कर बुजुर्गो की सेवा तभी सोने जाना
चलो अब इन संस्कारों से छुटकारा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।

विलासिता में हर कोई यहाँ अँधा
एकाकी जीवन घर घर का धंधा
संयुक्त कुटुंब की बात हुई पुरानी
जहाँ दुखों में सब देते थे कन्धा
अकेले रहने का आदी जग सारा हो गया
माँ बाप के आँगन का बटवारा हो गया।।
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सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

19 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
  2. RAJEEV GUPTA 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
  3. babucm 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
  4. mani 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
  5. sarvajit singh 16/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
  6. Kiran Kapur Gulati 17/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
  7. निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016

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