उस रोज !

उस रोज भीड़ में मैं भी खड़ा था
सामने खून में लतपथ कोई पड़ा था
उसे यकीन था कोई तो आगे आएगा
जिस उम्मीद से हाथ उसका आगे बढ़ा था.

फिर देख भीड़ की चुप्पी बोला इंसान कौन यहाँ सच्चा है !
अगर ये दुनिया है तो मर जाना ही अच्छा है.
फिर जो कहाँ था उसने वो सच हो गया,
न उठ सके कभी वो ऐसी नींद सो गया.

भीड़ भी बढ़ने लगी अपने – अपने रास्ते
मैं भी बढ़ रहां था अपने ही वास्ते,
ये सोचते हुये !
अगर ये हाथ उसकी तरफ बढ़ गया होता,
तो शायद किसी के घर का चिरांग बुझने से बच गया होता.

क्या इसके लिए माफ़ करेगा हमारा परमात्मा
उसका तो बस शरीर मरा था पर हमारी आत्मा……………..

– शिवम कुमार शर्मा

14 Comments

  1. Manjusha 14/07/2016
    • theshivam20 14/07/2016
  2. mani 14/07/2016
    • theshivam20 14/07/2016
  3. वेद प्रकाश राय 14/07/2016
    • theshivam20 14/07/2016
  4. babucm 14/07/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" 14/07/2016
  7. Arun Kant Shukla 14/07/2016
  8. r.n.yadav 14/07/2016
  9. pankaj 14/07/2016
  10. Prabhjot Kaur 14/07/2016
  11. shubham singh 14/07/2016

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