जन्नत की आग

बढ़ चला है ताप अब,
बर्फ को पिघलने दो !

रोको विष, न रुको, कदम को बढ़ा चलो,
आक्रोश में शिखर को थोड़ा पिघलने दो,
बन चला है जंगल, अब न रहा जन्नत,
काँटों के झुर्मुठों को थोड़ा तो सुलगने दो,
रहो सजग, मन में न विष कोई घुल पाये,
थाम लो फूलों को, न काँटों संग पलने दो ।

बढ़ चला है ताप अब,
बर्फ को पिघलने दो !

सह पर पाक के, न पाक दामन अब रहा,
आस्तीन के सांप को आस्तीन से निकलने दो,
षडयंत्र की जमात में कौटिल्य को याद कर,
विष को विष से काट, जीवन को संभलने दो,
न रहेगा राज्य तो राजनीति कर सकेगी क्या,
जन-मन से न खेलो, उनके मन को खिलने दो ।

बढ़ चला है ताप अब,
बर्फ को पिघलने दो !

धर्म के ठेकेदार, न दिशा गलत दिखलायें,
नापाक होते इरादों को जन में न फैलने दो,
हटा दो आडम्बर लिबास, हो सीमा में आजादी,
देशद्रोह की राजनीति की हवा निकलने दो,
धन का खेल, खेल रहे सब, धर्म के दुराचारी,
स्वर्ण सिंघासन से हटा, पिंजर में धकेल दो ।

बढ़ चला है ताप अब,
बर्फ को पिघलने दो !

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

16 Comments

  1. mani 13/07/2016
  2. babucm 13/07/2016
      • kiran kapur gulati 13/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
  4. sarvajit singh 13/07/2016
  5. ANU MAHESHWARI 14/07/2016
  6. Arun Kant Shukla 14/07/2016

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