शहर…….ग़ज़ल…सी.एम. शर्मा (बब्बू)…..

जो है अपना वही इतना बेगाना क्यूँ है….
इस शहर में हर शख्स अंजाना क्यूँ हूँ….

इश्क़ में रुस्वाइयां होना लाज़िम है फिर भी …
इस शहर में हर चर्चा मेरा अफसाना क्यूँ है….

रोज़ ही मिलते हैं बिछड़ते हैं सब लोग यहाँ….
इस शहर में फिर भी हर कोई बेगाना क्यूँ है…

घर की दीवारों पे बड़े बड़े नाम टंगे रहते हैं…
इस शहर में हर घर अपनों से अंजाना क्यूँ है…

नहीं इज्जत प्यार किसी के दिल में गर “बब्बू”…
इस शहर में फिर किसी को भी अपनाना क्यूँ है…

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/सी.एम. शर्मा (बब्बू)

20 Comments

  1. mani 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
      • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" 12/07/2016
    • babucm 12/07/2016
      • kiran kapur gulati 13/07/2016
        • babucm 13/07/2016
  4. sarvajit singh 12/07/2016
    • babucm 19/07/2016
  5. Meena bhardwaj 12/07/2016
    • babucm 13/07/2016

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