शीतलता – शिशिर मधुकर

तपती हुई जमीं को जब सुकून मिलने की कोई बात हो
खुदा से सब ये मिन्नत करो कि जम के फ़िर बरसात हो
चंद छींटों से अगन बुझती नहीं बस और बढ़ती जाती हैं
भीगता हैं तन बदन तब ही गहरी शीतलता धरा पाती है

शिशिर मधुकर

6 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" 10/07/2016
  3. mani 10/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 10/07/2016
  4. C.m.sharma(babbu) 10/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" 10/07/2016

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