मुक्ति – शिशिर मधुकर

एक नदियाँ के हमेशा से ही होते दो किनारे हैं
जब तक बहती हैं वो दोनों ही उसको प्यारे हैं
उनसे मुक्ति उसके सफर में तब ही हो पाती हैं
सब कुछ छोड़ वो जब सागर में समा जाती हैं.

शिशिर मधुकर

9 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 10/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 10/07/2016
  2. Meena bhardwaj 10/07/2016
    • Shishir "Madhukar" 10/07/2016
  3. mani 10/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" 10/07/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" 10/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/07/2016

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