मेरी माँ की कविता

आज दोपहर
मेरी माँ
मन में ठान लिया
लिखेगी कविता
कल, आज और कल
की बातें
बहुत सोचकर
उन्हे शब्दों में पिरोने चाहा
रचना चाहा कविता
इतने पर दस्तक हुआ
दरवाजे पर
खोलकर देखा तो
पिताजी को खड़े पाया
उन्हे ऎनक नहीं मिल रहा है
आखड़ा जाने की जल्दी है
प्यारी बहना को
पुस्तक नहीं मिल रही है
कालेज जाने की जल्दी है
और मेरी बेटी तो
अपने छोटी -छोटी कदमों से
चलकर
अपने दादी की
गले लग जाती है

मेरी माँ की सोच
शब्दों से वाक्य बनाना
छंद -अलंकार को ध्यान मे रखना
सब भूल जाती है
और उसकी कविता
मेरी बेटी के चेहरे पर
खो जाती है.

11 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/07/2016
    • chandramohan kisku 08/07/2016
  2. Meena bhardwaj 07/07/2016
    • chandramohan kisku 08/07/2016
  3. C.m.sharma(babbu) 07/07/2016
    • chandramohan kisku 08/07/2016
  4. mani 07/07/2016
    • chandramohan kisku 08/07/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 07/07/2016
    • chandramohan kisku 08/07/2016
  6. सीमा अलंग 14/08/2020

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