आशुतोषी माँ नर्मदा
(एक भक्त की क्षमा याचना )
सुशील शर्मा
आशुतोषी माँ नर्मदा अभय का वरदान दो।
शमित हो सब पाप मेरे ऐसा अंतर्ज्ञान दो।
विषम अंतर्दाह की पीड़ा से मुझे मुक्त करो।
हे मकरवाहनी पापों से मन को रिक्त करो।
मैंने निचोड़ा है आपके तट के खजाने को।
आपको ही नहीं लूटा मैने लूटा है ज़माने को।
मैंने बिगाड़ा आवरण ,पर्यावरण इस क्षेत्र का।
रेत लूटी और काटा जंगल पूरे परिक्षेत्र का।
मैंने अमित अत्याचार कर दुर्गति आपकी बनाई है।
लूट कर तट सम्पदा कब्र अपनी सजाई है।
सत्ता का सुख मिला मुझे आपके आशीषों से।
आपको ही लूट डाला मिलकर सत्ताधीशों से।
हे धन्यधारा माँ नर्मदे अब पड़ा तेरी शरण।
माँ अब अनुकूल होअो मेरा शीश अब तेरे चरण।
उमड़ता परिताप पश्चाताप का अब विकल्प है।
अब न होगा कोई पाप तेरे हितार्थ ये संकल्प है।
आशुतोषी माँ नर्मदा अभय का वरदान दो।
शमित हो सब पाप मेरे ऐसा अंतर्ज्ञान दो।
बहुत अच्छी रचना है जो प्रदुषण के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान आकर्षित करती है. बधाई…………
बहुत खूब सर…………………….
आप के भाव जैसे सब के भाव हों……तथा अस्तु…..
रचना के माध्यम से बहुत कुछ कह गए आप , राजनीतिज्ञों को आइना भी दिखा दिया, स्वार्थ निहित कि गई गलतियों को स्वीरकार कर माफ़ी भी मांग लिया ………..लेकिन सिर्फ माफीनामा काफी नहीं है !………आपने भौतिक सुख और स्वार्थ के लिए उठाये गए कदमो का परिणाम तो लाभ और हानि दोनों ही स्वरूपों में प्रतिफल स्वीकार करना ही होगा !!
अति सुंदर सुशील कुमार जी
अत्यन्त सुन्दर रचना ………….
अति सुंदर रचना………