दिल्ली का ताज

मसीहा मानकर ,दिल्ली का ताज दिया,
भ्रष्टाचार मिटेगा,मेहनत का इनाम दिया।

लेकिन फ्री-फ्री में डूब गए, डरती है नारी,
बिजली पानी सुरक्षा,अकाल पड़ा है भारी।

डिग्री का बवाल,हमारी समझ से परे था,
ईमानदारी का सर्टिफिकेट, बांटते फिरे था।

आम आदमी का ढोंग रचकर, लूटा हमको हैं,
माल खाकर फूले, हड्डियां चूसनी तो हमको हैं।

रायता फ़ैलाने,नौटंकी में,आपसा सानी नही,
सबूत है बहुत,तुमसा कोई अभिमानी नही।

देखना इस बार,बताएंगे हम दिल की बात,
आसमां से पटक जमीं पर, कर देंगे सात।

—–“रवि यादव अमेठीया”—–
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12 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/07/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 06/07/2016
  3. babucm 06/07/2016
    • Ravi Yadav 06/07/2016
  4. sarvajit singh 06/07/2016
  5. mani 06/07/2016
    • Ravi Yadav 06/07/2016

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