उलझे तेरी वातो मे रह लिये

फूलो की तरह ही काँटों मे रह लिये
मुद्दतो उलझे तेरी वातों मे रह लिये

परिन्दे वैचेन है पर नही परवाज को
यूँ हीं वंद हम जज्बातों मे रह लिये

दर्द से लिपटी यादो मे सिमटी हुई
उन वैचेन तन्हा रातों मे रह लिये

किस-किस से छुपाते दर्दो-गम अब
कुछ पल हम खुली किताबो से रह लिये

जिनमें चाहत, दर्द, आशिकी शुमार थी
मुद्दतो उलझे तेरी उन वातों मे रह लिये

14 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 04/07/2016
    • Nirdesh 07/07/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 07/07/2016
  2. mani 04/07/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 07/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/07/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 07/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/07/2016
  5. C.m.sharma(babbu) 04/07/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 08/07/2016
  6. Savita Verma 05/07/2016
    • Nirdesh Kudeshiya 08/07/2016
  7. Nirdesh Kudeshiya 08/07/2016

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