पैसा जन्य अमीरी, गरीबी

पैसा परिभाषित करती अमीरी और गरीबी को
कोई इठलाता यहाँ, कोई कोसता बदनसीबी को
पैसा जीवन बदल देता बनाता धनवानहै।
कितना धन उसके पास मे, नही कोई अनुमान है।
वह भव्य महलों का राजा, आसमाँ मे उड़ता है।
लौकिक संसाधन से युक्त भौतिकता मे जीता है
पैसे उसके रिस्ते नाते, पैसे से करता शादी है।
पैसे के दम पर पाता जग की सारी आजादी है।
भय नहीं कानून का, अवैध लाईसेंस से मुस्तैद है।
पैसे की खनक ऐसी कानून उसकी मुठ्ठी में कैद है।
लाख बुराई हो पर पैसा ढक लेता उसका खाज।
वही गरीब बेचारा एक एक पैसे के का मोहताज ।
उसके पास कौड़ी नही, नही कोई आशियाना है।
जहा खाली जगह मिली, वही धुनी रमाना है।
पैसे नही कि खरीदे तख्त पलंग, कुर्सी, मेज।
धरती माँ का बेटा है, धरती ही उसकी सेज ।
पथरीली राहों पर दौड़े पाव मे पड़ा छल्ला है
अंगुठा झाँकता जुते से, जूते मे नहीं तल्ला है।
फट गये जो लुंगी गमछा क्या कभी बदलेंगे।
हालात कहता है अभी तो 6 महीने और चलेंगे
गरीब की जवानी भी पौष की चादनी होती है।
चाहे बला कोई हो, गरीबों को परेशानी होती है।
चुभा काटा पैसे वाले को, सभी जान जाते है
निर्धन को साप डसे, मामुली घटना बतलाते है
गरीब जन्मजात दास, सबकी हुकुमत सहता है
पैसे वालों की बंशी पर, उसको नाचना पड़ता है।
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सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

15 Comments

  1. C.m.sharma(babbu) 03/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  3. mani 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  6. sarvajit singh 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  7. Dr Swati Gupta 03/07/2016
  8. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016

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