बेटी की विदाई और पिता के शब्द

मैने तुझे पीठ पर बिठाया था कभी बचपन मे
आज तेरी डोली सजा रहा हूँ अपने आँगन मे
मन रो रहा है मेरा पर होठों पर मुस्कुराहट है
मेरी लाडो तेरी जुदाई की अजीब छटपटाहट है
माँ की ममता बिझड़ रही है, बिछड रहा है भाई
दिल मे करुण क्रन्दन है तो द्वार पर है शहनाई
मेरे नीले गगन गर्भ की तू है एक चाद सितारा
ओझल हो रही नैनो से अब, बह रही अश्रुधारा
मन की मानो तो कहता है बस यही रुक जाओ
तोड़ दो जग के बन्धन, अब तूम न दूर जाओ
पर विवश हूँ आज मै मन के उद्गार किससे कहूँ
दुनिया का विधि विधान है, इससे कैसे बच के रहूँ
मै बाप जो ठहरा, खुल कर रो भी नही सकता
उपवन का माली अपना दर्द भला किससे कहता
बिटिया तेरे सपनो मे जो आता था राजकुमार
वही आया है तुझे ले जाने हो अश्व पर सवार
हमारी दुआँ है वह तुझको असीम प्यार करे
बूझे अन्तर्मन को न तुमसे कभी तकरार करे
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सुरेन्द्र नाथ सिंंह “कुशक्षत्रप”

22 Comments

  1. Ankita Anshu 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 03/07/2016
    • निवातियाँ डी. के. 03/07/2016
      • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  3. C.m.sharma(babbu) 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  4. bhupendradave 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  5. mani 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  7. अकिंत कुमार तिवारी 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  8. sarvajit singh 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016
  9. Dr Swati Gupta 03/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/07/2016

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