आडम्बर

सभ्य समाज में आडम्बर का प्रभाव हुआ,
जटिलता आ गयी सच्चाई का आभाव हुआ ।
भ्रम में डाला झूठ सत्य की छाया बनकर,
आडम्बर छाने लगा मंत्र और माया बनकर।

छिपा दिनमान तो अँधेरा नज़र आने लगा,
रजनी घनघोर हुई जुगनू टिमटिमाने लगा ।
वास्तविक जानकर जुगनू की क्षणिक आभा को,
पथिक भी राह भुला खो दिया निज आपा को।

हुई वर्षात तो नदी के जल का नूर गया,
उसी अंदाज़ में नाले का जल सुरूर भरा ।
स्वच्छता छिप गयी मटमैला जल प्रवाह हुआ,
वास्तविक साये में जब काल्पनिक प्रभाव हुआ ।

आडम्बर रचके मानव भाग्य को बताने लगा,
आडम्बर जाल में इंसान को फसाने लगा ।
आलोक लुप्त हुआ अंधकार छाने लगा,
फिर भी इंसान को उसी में मजा आने लगा ।

अंध विश्वास में शीशे को मणि मान लिए,
स्वर्ग की सीढ़ी है यह ऐसा मन में ठान लिए।
कलई धूल गयी तो शीशा नज़र आने लगा,
ठगा महसूस कर राही भी तब पछताने लगा ।

आडम्बर मंत्र का कुछ लोगों ने जाप किया ,
हताशा हाथ लगी जिसने ऐसा काम किया ।
उपाधि छीन गयी समाज में उपहास हुआ,
भेद जब खुल गया तो मन बड़ा उदास हुआ।

अंत में हारकर रोते है आडम्बरधारी,
मुह तो काला हुआ लूट गई सोहरत सारी।
व्यर्थ यह जन्म हुआ पाप कमाया मैनें,
समय अनमोल था जो उसको गवायाँ मैनें।

6 Comments

  1. babucm 02/07/2016
    • लालजी सिंह यादव 02/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" 02/07/2016
    • लालजी सिंह यादव 02/07/2016
  3. sarvajit singh 04/07/2016
  4. लालजी सिंह यादव 04/07/2016

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